2017年5月29日,星期一

हीरा



नाज़-ओ-हिफाज़त में थे अपने शहर की गलियों में,
तिजोरी में तो सोना भी पीतल हो जाता है,

रखे कदम जो चौखट के बाहर तो समझा,
तराशे जाने पर तो कोयला भी हीरा बन जाता है।

2017年5月26日,星期五

他们说“生活很难”,请问“相比什么?”
-来源不明

2017年5月24日星期三

书评:千姿百态的太阳


一千个灿烂的太阳-来自Khaled Hosseini的另一个奇迹。他以这种令人毛骨悚然的方式为阿富汗的不人道现实画上了句号。

在此之前,我已阅读并阅读过 追风筝的人 来自同一位作者,非常吸引人,我也买了这本书。现在,我正在珍藏他的第三本书, 和山生态 也一样

故事叙述了两位女性主角玛丽亚姆(Mariam)和莱拉(Laila)在甚至禁止基本人权的情况下的斗争。这就是苏联统治阿富汗,后来到达塔利班的故事。周期性的政治转变影响了该国公民的生活和“死亡”。

这部小说很好地刻画了我们大多数人都不知道的阿富汗严峻的局势。作为那个社会中的女性,玛丽亚姆(Mariam)和莱拉(Laila)的主要角色必须承受自己一生的罪恶,并为此付出生命的挣扎。

对我来说,这本书传达了一个信息,那就是,我们常常为未得到的东西而哀悼,却忘记了自己拥有的东西。我们必须感谢并感谢上帝赐予我们这种美好的生活,使我们在我们所处的地方出生,最重要的是自由是人类生存的最重要条件,不幸的是许多人没有这种自由。

我对这本书的评分为4.5星(满分5分),并向所有小说爱好者推荐免责声明:这本书会给您带来种种阴郁的感觉,而不是一个幸运儿!您有时可能会以悲伤的心情入睡。这可能会使您长时间思考。我个人非常喜欢Mariam和Laila,以至于我曾经悔改他们生活中发生的一切,就好像他们是我周围的一些活人一样。这就是哈立德·侯赛尼(Khaled Hosseini)不可推翻的写作的神奇法术。

(PS:此处表示的评论是根据我的个人阅读经验得出的,无意诽谤,贬低或 
降低该书的销售量,反之亦然。写这篇评论没有给我酬劳。


如果您是作者,并且希望对书进行审阅,请发送电子邮件至 bookreviews@mansiladha.com.

2017年5月17日星期三

खोया हुआ खिलौना और टूटी हुई पेंसिल

在屋顶上िछी जब दरी होती थी,
चाँद के पार एक परी होती थी,

ग़मो की गठरी का बस इतना था बोझ,
bोया हुआ खिलौना और टूटी हुई पेंसिल होती थी,

कट्टी और सॉरी का सिलसिला होता हर रोज़,
रिश्तों के सौदे कि गुफ़्तगू इतनी सस्ती होती थी,

प्रतिस्पर्धा यूँ शुरू और ख़त्म होती थी,
什么时候ागज़ की नाव से रेस दोस्तों संग होती थी,

खाली थे हाथ फिर भी ऊँची उड़ान होती थी,
जेब में भरी एक रंगीन तितली होती थी,

कितनी सरल वो ज़िंदगी होती थी,
टूटी गुल्लक से पायी जब चंद सिक्कों कि अमीरी होती थी,

गर्मी कि छुट्टियों में होता शाम का इंतज़ार,
बर्फ़ के लड्डू कि मिठास ऐसी मोहक होती थी,

क्लास में पूछती जब टीचर क्या बनना है,
पायलट और हीरो कहते हुए चहरे पर चमक होती थी,

ऊंची लगती जब मंदिर की घंटी थी,
बड़े होने की बड़ी जल्दी होती थी,

कैसे लौट आयें वो लड़कपन के दिन,
什么时候ुबह के बाद रात नहीं शामें भी होती थी |

2017年5月14日星期日

क्या तोहफ़ा दूँ तुम्हें माँ



वो ख़फा़ हो फिर भी दुलार देती है,
माँ जुदा हो फिर भी प्यार देती है,

हमारी हर भूल को भूला देती है,
वो माँ ही है जो हमें रोज़ दुआ देती है |

माँ वो है जिसने हमें जीवन दिया है और जिसने अपना जीवन हमें दे दिया है | बहुत विचार किया परन्तु इसके समक्ष कोई भी 盛宴ार तुच्छ प्रतीत हुआ | इसलिए कुछ शब्द ही पिरो दिए इस कविता के रूप में |


क्या 盛宴ार दूँ तुम्हें मैं,
तुमने जीवन दान दिया हैं माँ।

मुस्कान होठों पर सदा सजाये,
तुमने हर बलिदान दिया है माँ।

तुलना कैसे करूँ तुम्हारी,
तुमसा कहाँ है कोई माँ।

चाहे तुम हो रूठी हमसे,
चिंता फिर भी करती माँ।

कहा जगत ने जपो हरि भजन,
मैंने केवल कह दिया "माँ"। 

क्या 盛宴ार दूँ समझ ना आये,
谢谢ै तुमको माँ।