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2014年8月12日,星期二

मुसाफिर



चलいे रहते हैं मुसाफिर, अपने आशियाने कि तलाश में.....क्या अचरज है,
ठह로े हैं कुछ अरसा, फिर जारी रखते हैं सफर को.....क्या अचरज है,
ट로ाती हैं राहें किसी मोड़ पर, मिलते हैं नसीब इत्तिफ़ाक़ से...क्या अचरज है,
हँसते हुए बढ़ जाते हैं आगे, क्योंकि मंज़िल तो सबकी मुख्तलिफ है....क्या अचरज है,
सामान है ज़स्बात, गठरी बाँधी और अगले सहर कोई और शहर...क्या अचरज है,
एいबार क्या करें किसी हमराही का, कल को ग़र गठरी उठाये हम ही चले जाए...

क्या अचरज है|