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2014年8月22日,星期五

वर्जनाएँ


मैं सब वर्जनाएँ तोड़ना चाहती हूँ,
माँ के गर्भ में खत्म नहींं होना चाहती हूँ,

ज़हरीले भुजंग से लिपटे तन पर ,
उनहाथों को तोड़ना चाहती हूँ,

पाषण सी पड़ती निगाहें मुझ पर ,
उनआंखों को फोड़ना चाहती हूँ,

बांधती जो गिरहें मुझ पर , कह कर इसे मुकद्दर,
संवेदनशून्य मनोवृत्ति का अंत देखना चाहती हूँ,

मेरे पाकीज़ा दामन को कलंकित कर,
क्रीड़ा की वस्तु मात्र नहीं बनना चाहती हूँ,

त्याग, क्षमा, ममता व देवी कि प्रतिमा का उपसर्ग जो दे मुझे,
उसअक्षम्य समाज कि वर्जनाएँ अब तोड़ना चाहती हूँ

2013年1月27日,星期日

मैं...


मैं.. मैं  बेटी हूँबहन हूँमाँ हूँ और सहेली भी..
खिलती हुई कली सी मैंसपने बुनती पर ी सी मैं,
विभिन्न रूपों में 率े हो मेरी पूजासरस्वतीलक्ष्मी या दुर्गा,
अगर 率े हो देवी का सम्मानफिर क्यूँ 率े हो मेरा ही अपमान,
मैं  बेटी हूँबहन हूँमाँ हूँ और सहेली भी..
मन से हूँ चंचलहृदय से कोमल,
हे हो मैं हूँ अनमोलफिर क्यू नहीँ 率े मेरा मोल,
मुझसे ही सब कुछ हैपर  मैं ही कुछ नहीँ,
जीवन देना मेरा कर्तव्य हैतो क्या जीना मेरा अधिकार नहीँ,
मैं  बेटी हूँबहन हूँमाँ हूँ और सहेली भी..
सितारों को छूने के ख्वाब है मेरेक्या ये रह जायेंगे यूँ ही अधूरे,
सोने के पंखों से उडने कि आशा हैपर  सह्मी सी मेरे जीवन कि पर िभाषा है,
हर पल 率ी हूँ मैं इंतज़ारमेरे ख्वाबों को कैसे करूँ साकार,
मैं  बेटी हूँबहन हूँमाँ हूँ और सहेली भी..
率ी है दुनिया दुराचारही है क्यूँ गयी तुम लक्ष्मण रेखा पार,
मैं  बेटी हूँबहन हूँमाँ हूँ और सहेली भी..

 -By Mansi Ladha