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2015年3月29日,星期日

ना सोचा है


किस ओर चलूं ना सोचा है,
किस ठोर थमु ना सोचा है,

चलいे रहूँ या राह चुनूं,
मंज़िल कि तलाश करूँ,
या खड़ी रहूँ चौराहों पे,
किस ओर बढ़ूँ ना सोचा है |

朝三ां को भर लूँ मुट्ठी में,
या छोड़ दूँ खुली हाथ कि लकीरों को,
ज़िद करूँ क्या लड़ने कि,
क्या हाल चुनूं ना सोचा है | 

दिल तोड़ चलूँ या मन जोड़ चलूँ,
रुख मोड़ चलूँ या जग छोड़ चलूँ,
दो कदम चलूँ या दौड़ चलूँ,
या ख्वाब चुनूं ना सोचा है ||

2015年1月19日,星期一

我是 ..


他们称我优雅,称我漂亮,
他们称我为精明,他们称我为机智,
我说我不适合时装模特的尺寸,
他们说我在说谎
我的腰部和臀部的曲线,
我脸颊上的魅力和我双眼的牵引引力,
这就是吸引全世界幻想的一切,
我是一个女人,或者仅仅是一个女人。

我走进房间,随你喜欢,
我有能力忍受令人讨厌的责备,
我有勇气入侵他们的re绳,
我有立场,很少屈曲,
我从不哭泣,不喜欢潮流,
我的力量非凡,这就是我的理性,
我是一个女人,或者仅仅是一个女人。

2015年1月3日,星期六

ना सीखी होशियारी...

होशियारी मिलती नहीं बाज़ार में,
感觉ारी बिकती नहीं दुकान पे,
मिले ग़र दुनियादारी का ठेकेदार,
我们是ोंगे उसके पहले खरीददार|


2015年1月1日,星期四

新新娘्ष की शुभकामनाएँ

साल तो बहुत आए बहुत गए,
आशा है ये साल बीते हुए हर साल से खूबसूरत हो जाए,
लिए सभी के प्रति सौहाद्र और सुकून कि भावनाएँ |

सबा जीवन बेहतर स्वास्थ्य और हर्ष से भर आए,
पूर्ण हो हर जन की मनोकामनाएँ,
新新娘्ष की सबको शुभकामनाएँ |

2014年12月27日,星期六

बेगुनाह



उसे वतन सरहदों ने मुक़र्रर करवाया,
उसे मज़हब परिवार ने मंसूब करवाया|

那ेक़सूर मोहरे को जिंदा से मुर्दा बेरहम जहान ने बनाया,
उसे इंतिक़ाम-ओ-दहशत का शिकार दहशत-गर्दो ने बनाया||


2014年11月23日,星期日

沉默之声


寂静的声音,
像碎玻璃一样落在地板上,
进入空荡荡的大厅的寂寞,
像脚下的指甲一样刺破每一步,

寂静的声音,
像毒蛇的强大爬行一样蠕动,
回荡成一束无声的卷,
像坚硬的雪球一样塌陷在自我之中。

2014年11月9日,星期日

खामोशी में भी शोर सा है


है ये ढलता हुआ सूरज, मगर दिखता सुनहरी भोर सा है,
खामोशी में भी शोर सा है,

है ये धुँधला कोहरा, मगर दिखता ठंडी ओस सा है,
खामोशी में भी शोर सा है,

है ये मज़बूत बंधन, मगर दिखता कच्ची डोर सा है,
खामोशी में भी शोर सा है|

2014年10月30日,星期四

लम्हा

ये लम्हा भी यूँ ही बीत जायेगा,
下一页ा लम्हा भी कौनसा साथ निभायेगा,
填充ो हर लम्हा अपनी बाहों में,
क्या पता, कौनसा लम्हा आखरी कहलायेगा ||

2014年10月18日,星期六

फिर से दिवाली आयी है


फिर से दिवाली आयी है,
फिर बाज़ार में रौनक छायी है,
फिर माँ दीये जलायेंगी,
फिर पापा सीरीज़ लगायेंगे,

फिर से दिवाली आयी है,
फिर रातें दिन से ज़्यादा रौशन हो जायेगी,
फिर घर आँगन में रंगोली सजेगी,
फिर किचन से घी कि खुशबू हर कमरे में फैल जायेगी,

फिर से दिवाली आयी है,
फिर नए कपड़ों कि महक मन को बहलायेगी,
फिर नन्हे शैतान पटाखे-फुलझड़ी जलायेंगे,
फिर पकवान और तोहफे ख़ुशियाँ लायेंगे

2014年10月12日星期日

लफ्ज़-ओ-अल्फाज़


कुछ खयाल और कुछ हक़ीक़त मिलते हैं जमाने में,
बयान करते हैं उन्हें अपने रह-ओ-रस्म से अफसाने में,

ग़ुल-ए-बाज़ार में महकता है हर इक गुलाब जैसे,
शाम-ओ-सुबह चलती है हमारी ये कलम वैसे,

नज़्म-ओ-मज़मून या कभी कभार साज़-ओ-तराने में,
उम्मीद है निगार हो इस मुसंफा के ज़खीरा-A-al्फाज़ में,

मुख्तलिफ ज़बान में लिखने कि आज़माइश करते हैं,
怜悯ो ख़ुदा कि तो पेश करते रहेंगे नई मोसिकि कयी बार ||


您的े  拉奥拉沙्म - my way, ग़ुल-ए-बाज़ार - market of roses, नज़्म - poetry, 马赞ून - articleनिगार - beautiful, मुसंफा - writer, ज़खीरा-  storage, मुख्तलिफ - various, ज़बान - languages, Azamाइश - trial, मोसिकि - composition


2014年10月4日,星期六

像一封未发送的信



就像一封未发送的信, 
像模糊纸牌, 
像湿毛衣一样 
就像墙那么大 
更加公平。 

像没有草的草地 
就像shadow强的影子 
像未射箭一样 
像哭泣的寡妇一样 
您应避免明日行事 
















2014年10月2日,星期四

प्रिय मच्छर


वो गुनगुनाना तुम्हारा, वो मीठी सी तान,
छु लेती थी मेरे कानों के तार सच मान,

आते थे तुम जब नजदीक,
मांगती थी मैँ नींद कि भीख,

सुनाते थे तुम नित नए गीत,
याद है तुम्हारा वो मधुर संगीत,

जगा देते थे गहरी नींद से मुझे,
然后ी आता था चैन तुझे |

现在्यूँ समझ ना आती आहट तुम्हारे आने की,
सज़ा कैसे दूं तुम्हें चुपके से काट जाने की,

डंक मार कर चले जाते हो, मन में ही मुस्काते हो,
रंगे हाथों पकड़ु कैसे तुम तो उड़ जाते हो, 

हो गए अब तुम भी चतुर चालाक,
今天ाओ बस एक बार मेरे हाथ,

किया है मैंने तुम्हे रक्तदान,
उफ्फ... क्यूँ बन रहे तुम अनजान !

2014年9月26日,星期五

चंचल मन





चंचल मन है नटखट ऐसा,

कभी भागता इक ओर, कभी दौड़ता उस छोर,

它的े खालीपन में गुंजित होती एक आस कहीं,

跨越ाता उल्लास से अगले पल बस यूँ ही |


नाचता है मद भरे मोर सा कभी,

कराहता गम भरे अनाथ सा कभी,

कैसे जताये इस पर अपना अधिकार,

ये ना करता हमारी इच्छा अभिसार ||













2014年9月20日,星期六

राज़



लफ्जों से गूफ्तगू में बेपरवाह वो ख़ुद को धोखा दे जाते हैं,

लाख कोशिश कर ले महफूज़ रखने की,

बेमानी करती हैं उनकी पलकें,

झुकते हुए हर राज़ से पर्दा उठा देती हैं

2014年9月7日,星期日

तुम्हारे बिना



तुम्हारे बिना मेरा जीवन,
जैसे जलेबी बिना पोहे,
जैसे मलाई बिना चाय,
जैसे कंकड़ बिना चावल,
जैसे टपकती हुई आइसक्रीम||

तुम्हारे बिना मेरा जीवन,
जैसे सास बिना सीरियल,
जैसे address बिना पिन कोड,
जैसे  मेक-अप बिना हीरोइन||

तुम्हारे संग मेरा जीवन,
जैसे बारिश संग मेंढक,
जैसे हार्न संग स्कूटर,
जैसे सरकार संग भ्रष्टाचार||

तुम्हारे संग मेरा जीवन,
जैसे बाल संग टकला,
जैसे फॉल संग साड़ी,
जैसे पंखे संग हवा,
जैसे मोबाइल संग व्हाट्सएप्प (Whatsapp)|


2014年8月22日,星期五

वर्जनाएँ


मैं सब वर्जनाएँ तोड़ना चाहती हूँ,
माँ के गर्भ में खत्म नहींं होना चाहती हूँ,

ज़हरीले भुजंग से लिपटे तन पर,
那些是ाथों को तोड़ना चाहती हूँ,

पाषण सी पड़ती निगाहें मुझ पर,
那些来ंखों को फोड़ना चाहती हूँ,

बांधती जो गिरहें मुझ पर, कह कर इसे मुकद्दर,
那ंवेदनशून्य मनोवृत्ति का अंत देखना चाहती हूँ,

मेरे पाकीज़ा दामन को कलंकित कर,
क्रीड़ा की वस्तु मात्र नहीं बनना चाहती हूँ,

त्याग, क्षमा, ममता व देवी कि प्रतिमा का उपसर्ग जो दे मुझे,
那个阿克्षम्य समाज कि वर्जनाएँ अब तोड़ना चाहती हूँ

2014年8月15日,星期五

बातें


कुछ लोग करते हैं, कुछ नही,
कुछ लंबी होती हैं, कुछ छोटी,

कुछ चकित करती हैं, कुछ हर्षित करती हैं,
कुछ ख्वाब में होती हैं, कुछ एहसास में,

कुछ आंखों से होती हैं, कुछ ज़ुबान से,
कुछ दिल से होती हैं, कुछ दिमाग से,

कुछ अनकही होती हैं, कुछ कहकहे लाती हैं,
कुछ हम सुनते हैं, कुछ अनसुनी करते हैं,

कुछ मासूम होती हैं, कुछ कर्कश,
कुछ स्पष्ट होती हैं, कुछ दोहरी,

कुछ से समय बीतता है, कुछ समय के साथ बीत जाती हैं,
कुछ दिल को छु लेती हैं, कुछ रूह को तोड़ देती हैं,

कुछ हो जाती हैं, कुछ यूँ ही खो जाती हैं,
कुछ सवाल छोड़ जाती हैं, कुछ जवाब बन जाती हैं...

2014年8月12日,星期二

मुसाफिर



चलいे रहते हैं मुसाफिर, अपने आशियाने कि तलाश में.....क्या अचरज है,
ठह로े हैं कुछ अरसा, फिर जारी रखते हैं सफर को.....क्या अचरज है,
ट로ाती हैं राहें किसी मोड़ पर, मिलते हैं नसीब इत्तिफ़ाक़ से...क्या अचरज है,
हँसते हुए बढ़ जाते हैं आगे, क्योंकि मंज़िल तो सबकी मुख्तलिफ है....क्या अचरज है,
सामान है ज़स्बात, गठरी बाँधी और अगले सहर कोई और शहर...क्या अचरज है,
एいबार क्या करें किसी हमराही का, कल को ग़र गठरी उठाये हम ही चले जाए...

क्या अचरज है|

2014年8月2日,星期六

नीर

कभी है यह निर्मल, निरभ्र, निर्झर, नटखट,
कभी खो जाता हो अकस्मात निश्चल, नीरव, निर्जल,

नदी बन कर बहता कल-कल,
तृप्त करता जन - जन कि क्षुधा बेकल,

सागर में भर जाता जैसे नीलम,
स्पर्श करता क्षितिज द्वारा नील गगन,

扫走了ाता नयन से हो निर्बल,
जैसे हो पावन गंगाजल,

प्रकृति के क्रोध का बनता माध्यम,
ले जाता जीवों का जीवन, भवन और आँगन,

धो देता कभी अस्थि के संग मानव पापों का भार,
गिरता धरा पर कभी बन रिमझिम बूँदों का दुलार,

देश विदेश कि सीमा से अपार,
यहां वहां बहता सनातन सदाबहार

2014年6月7日,星期六

जुनून

साहिल पर बैठ क्यूं तेरी नाकामी पर अश्क बहता है,
टूटी है कश्ती तो मार ले गोता उस समंदर में,
तोड़ उसका गुरुर,भीगो दे उसे तेरे आँसुओं से,


没有ामयाबी का है जुनून, मुकम्मल कर तैराकी पर फ़तेह,
首页ूब गया तो ज़िंदगी भर का गुमान ना रहेगा,
पर्वर दीगर से सीना तान दलील तो कर सकेगा


 

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